शांति संभव है

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तुम्हारी जिंदगी में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तुम जीवित हो। इससे महत्वपूर्ण बात और कोई नहीं है। आगे जो कुछ भी होगा, वह इसलिए होगा कि तुम जीवित हो। जिस भी चीज़ का तुम दिन भर अभ्यास करते हो, उसमें तुम माहिर हो जाओगे। अगर तुम दिन भर गुस्सा करने का अभ्यास करते हो तो तुम गुस्सा करने में बड़े माहिर हो जाओगे। अर्थात कोई बात न भी हो तो भी तुम गुस्सा करने लगोगे।

सोचने की बात है कि तुम किस चीज़ का अभ्यास करते हो? भगवान का अभ्यास करते हो या दुनिया का अभ्यास करते हो? शांति का अभ्यास करते हो? या, अशांति का अभ्यास करते हो? तुम अपने को जैसा भी पाते हो, वह इसलिए है कि तुमने उस चीज़ का अभ्यास सबसे ज्यादा किया है। अगर तुम्हारी जिंदगी के अंदर अंधेरा है तो तुमने अंधेरे का अभ्यास ज्यादा किया है, प्रकाश का नहीं। इसलिए अंधेरे में पहुंच गये।

सरल हो गया है! जानने का अभ्यास करोगे तो जान जाओगे। अगर अज्ञानता का अभ्यास करोगे तो अज्ञानता में जाकर के पहुंचोगे। अगर तुम भगवान का अभ्यास करना शुरू करोगे, जो तुम्हारे अंदर स्थित है तो वह तुम्हारे लिए सरल हो जाएगा। अशांति से हटकर शांति की तरफ जाने का अभ्यास करोगे तो तुम्हारी जिंदगी के अंदर शांति की तरफ जाना सरल हो जाएगा। जो चीज़ मुश्किल है, अगर तुम अपनी जिंदगी से उस मुश्किल को हटाना चाहते हो तो तुमको उस चीज़ का अभ्यास करना चाहिए।

अगर तुम सुख चाहते हो तो सुख तुम्हारे अंदर है, और वह असली सुख है। मैं उसके बारे में बता रहा रहा हूँ जो तुम्हारी आखिरी स्वांस तक चल सके। कौन सा ऐसा रिश्ता है इस संसार के अंदर जो आखिरी समय तक चल सकेगा? आखिरी समय तक। कोई नाता नहीं है इस संसार का, कोई रिश्ता नहीं है इस संसार का, जो आखिरी स्वांस तक चले। जो हर स्वांस में स्थित आनंद है, अगर तुम उस आनंद से जुड़ना चाहते हो तो वही एक ऐसा नाता है जो अंत समय तक तुम्हारे साथ रहेगा। और कुछ नहीं रहेगा। अंत समय मनुष्य का आता ज़रूर है परंतु अगर अभ्यास नहीं है उस परमसुख का और परमशांति का तो तुम भटक जाओगे।

जिसकी आपको तलाश है, जिस शांति की आपको तलाश है, वह आपके अंदर स्थित है.

— प्रेम रावत (महाराजी)  Shanti sambhav hai